बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 चतुर्थ (A) प्रश्नपत्र - पर्यावरणीय शिक्षा बीएड सेमेस्टर-2 चतुर्थ (A) प्रश्नपत्र - पर्यावरणीय शिक्षासरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 चतुर्थ (A) प्रश्नपत्र - पर्यावरणीय शिक्षा - सरल प्रश्नोत्तर
अध्याय - 1 पर्यावरणीय शिक्षा : आधारभूत अवधारणा
(Environmental Education : Basic Concept)
प्रश्न- पर्यावरण को परिभाषित कीजिए तथा इसकी विशेषताओं एवं प्रकारों का 'वर्णन कीजिए।
अथवा
पर्यावरण का अर्थ स्पष्ट कीजिए एवं उसकी विशेषताओं एवं प्रकारों को समझाइए।
उत्तर-
पर्यावरण का अर्थ
मनुष्य के चारों ओर एक ऐसा पर्यावरण है, जो मानव की बुद्धि और प्रक्रियाओं के द्वारा उत्पन्न नहीं हुआ है अपितु यह पूर्णरूप से प्राकृतिक परिस्थितियों की देन है। प्रकृति द्वारा बनाये गये इस तरह के पर्यावरण को प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण कहते हैं। भौगोलिक पर्यावरण में वे सब परिस्थितियाँ सम्मिलित होती हैं, जो प्रकृति मानव को प्रदान करती है। जैसे—पृथ्वी, ऋतुयें, फल-फूल, वृक्ष, नदी, पर्वत, सागर आदि।
भौगोलिक पर्यावरण से तात्पर्य ऐसी ऐहिक दशाओं से है जिनका अस्तित्व मनुष्य के कार्यों से स्वतन्त्र है, जो मानव रचित नहीं है और बिना मनुष्य के अस्तित्व और कार्यों से प्रभावित हुए स्वतः परिवर्तित होती है।
कुछ वैज्ञानिकों ने पर्यावरण शब्द की अपेक्षा habitat शब्द या milieu शब्द का प्रयोग किया है जिसका अभिप्राय भी समस्त पारिस्थितिकी अथवा परिवृत्ति से है।
पर्यावरण शब्द फ्रेंच भाषा के Environer शब्द से बना है जिसका अभिप्रायः समस्त पारिस्थितिकी अथवा परिवृत्ति होता है। इसके अन्तर्गत सभी स्थितियाँ, परिस्थितियाँ, दशायें तथा प्रभाव जो कि जैव अथवा जैवकीय समूह पर प्रभाव डाल रहा है, सम्मिलित हैं।
यदि हम भारतीय दार्शनिक आधार पर पर्यावरण का अर्थ एवं पर्यावरण घटकों के विषय में जानें तो भारतीय दर्शन में आधुनिक पर्यावरण शब्द के स्थान पर 'प्रकृति' तथा 'सृष्टि' जैसे शब्दों का उपयोग किया गया है। प्रकृति अथवा सृष्टि जैसे शब्दों की व्यापकता वैज्ञानिक आधार पर आधुनिक शब्द अथवा पश्चिमी विचार पर्यावरण की अपेक्षा कहीं अधिक है।
भारतीय दर्शन प्राचीन काल से ही प्रकृति प्रधान एवं प्रकृति संरक्षणवादी रहा है। हमारे धर्म ग्रन्थों में भी जल, वायु, अग्नि, वृक्ष, जीव तथा भूमि की पूजा पर जोर दिया गया है, अर्थात् प्रकृति के इन सभी घटकों की महत्ता को स्वीकार किया गया है। भारतीय धर्मग्रन्थों में उल्लिखित प्रकृति शब्द यह विचार सामने रखता है कि वह किसी में समाहित नहीं है, वरन् उसके सभी सदस्य (घटक) परिवार में समाहित हैं। परिवार की भाँति उसके पर्यावरण में भी विभिन्न घटकों के बीच संसर्ग अवश्यंभावी है। अनेक बार यह संसर्ग पर्यावरण को विषम परिस्थितियों की ओर ले जाता है। कई बार इस तरह की विषम परिस्थितियाँ निर्जीव घटकों में कुछ प्राकृतिक घटनाओं के कारण उत्पन्न हो जाती हैं। इन प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाव हेतु परस्पर सामंजस्य की प्रक्रिया पर्यावरण को स्वतः सुधार प्रणाली की ओर ले जाती है। विकास के दौर में जो जीव अस्तित्व बनाये रखते हैं, वे योग्य समझे जाते हैं। यही कारण है कि वर्तमान पर्यावरण में मनुष्य श्रेष्ठ तथा सर्वोपरि समझा जाता है।
पर्यावरण भौगोलिक अध्ययन का एक केन्द्रीय बिन्दु है। भौगोलिक दृष्टि से पर्यावरण के अध्ययन में मोटे तौर पर स्थल मण्डल, जल मण्डल, वायु मण्डल तथा जैव मण्डल का अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन में पर्यावरण का मानव पर प्रभाव तथा मानव का पर्यावरण पर प्रभाव आदि का विश्लेषण व मूल्यांकन किया जाता है।
पर्यावरण की परिभाषा
पर्यावरण वह परिवृत्ति है जो मानव को चारों ओर से घेरे हुए है तथा उसके जीवन व क्रियाओं पर प्रभाव डालती है। इस परिवृत्ति अथवा परिस्थिति में मनुष्य से बाहर के समस्त तथ्य, वस्तुयें, स्थितियाँ तथा दशायें सम्मिलित होती हैं, जिनकी क्रियायें मनुष्य के जीवन विकास को प्रभावित करती हैं।
फिटिंग के अनुसार - "जीवों के पारिस्थितिकी कारकों का योग पर्यावरण है।" अर्थात् जीवन की पारिस्थितिकी के समस्त तथ्य मिलकर वातावरण कहलाते हैं।
टाँसले के अनुसार - “प्रभावकारी दशाओं का वह सम्पूर्ण योग जिसमें जीव रहते वातावरण कहलाता है।"
हर्सकोविट्स के अनुसार - "वातावरण उन सभी बाहरी दशाओं और प्रभावों का योग है, जो प्राणी के जीवन और विकास पर प्रभाव डालते हैं।"
मैकाइवर के अनुसार - "पृथ्वी का धरातल और उसकी सारी प्राकृतिक दशायें - प्राकृतिक संसाधन, भूमि, जल, पर्वत, मैदान, खनिज पदार्थ, पौधे, पशु तथा सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियाँ जो पृथ्वी पर विद्यमान होकर मानव जीवन को प्रभावित करती हैं, भौगोलिक पर्यावरण के अन्तर्गत आती हैं।"
सोरोकिन के अनुसार - “भौगोलिक पर्यावरण का तात्पर्य ऐसी दशाओं और घटनाओं से है जिनका अस्तित्व मनुष्य के कार्यों से स्वतन्त्र है, जो मानव रचित नहीं है और बिना मनुष्य के अस्तित्व और कार्यों से प्रभावित हुए स्वतः परिवर्तित होती है।"
भूगोल परिभाषा कोष के अनुसार - "चारों ओर की उन बाहरी दशाओं का सम्पूर्ण योग, जिसके अन्दर एक जीव अथवा समुदाय रहता है या कोई वस्तु उपस्थित रहती है।”
टी.एन. खुश के अनुसार - "उन सब दशाओं का योग जो कि जीवधारियों के जीवन और विकास को प्रभावित करता हो, पर्यावरण है।”
वस्तुतः पर्यावरण विभिन्न अन्तनिर्भर घटकों-सजीव एवं निर्जीव के मध्य सामंजस्य एवं पूर्णता (प्रकृति) की अवधारणा है। पर्यावरण का निर्जीव घटक पाँच मुख्य उपघटकों में विभाजित है। जैसे-ऊर्जा, पानी, मिट्टी, हवा तथा अंतरिक्ष। सजीवों के अनेक उप-घटक हैं जो न तो उत्पन्न किये जा सकते हैं और न ही समाप्त। हाँ इन्हें एक से दूसरे में रूपान्तरित किया जा सकता है। इस प्रकार सजीव तथा निर्जीव में कोई मूलभूत अन्तर नहीं है। एक स्वरूप में यदि कोई उत्पादक है, तो वह दूसरे रूप में उत्पाद भी हो सकता है। यही प्रकृति भी है।
पर्यावरण की विशेषतायें
पर्यावरण की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं-
(i) पर्यावरण भौतिक तत्वों का समूह या तत्व समुच्चय होता है।
(ii) भौतिक पर्यावरण अपार शक्ति का भण्डार है।
(iii) पर्यावरण में विशिष्ट भौतिक प्रक्रिया कार्यरत रहती हैं।
(iv) पर्यावरण का प्रभाव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में पड़ता है।
(v) यह परिवर्तनशील होता है।
(vi) यह स्वपोषण और स्वनियन्त्रण प्रणाली पर आधारित है।
(vii) इसमें क्षेत्रीय विविधता होती है।
(viii) इसमें पार्थिव एकता पाई जाती है।
(ix) यह जैव जगत का निवास्य या परिस्थान है।
(x) यह संसाधनों का भण्डार है।
पर्यावरण के प्रकार
पर्यावरण के निम्नलिखित दो प्रकार होते हैं-
1. भौतिक या प्राकृतिक पर्यावरण
2. सांस्कृतिक या मानव निर्मित पर्यावरण
1. भौतिक या प्राकृतिक पर्यावरण - भौतिक पर्यावरण से तात्पर्य उन भौतिक क्रियाओं, प्रक्रियाओं और तत्वों से लिया जाता है जिनका मानव पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। भौतिक शक्तियों में सौर्थिक शक्ति (तापमान), पृथ्वी की दैनिक व वार्षिक गति, गुरुत्वाकर्षण शक्ति भूपटल को प्रभावित करने वाले बल, ज्वालामुखी, भूकम्प आदि शामिल किये जाते हैं। इन शक्तियों द्वारा पृथ्वी पर अनेक प्रकार की क्रियायें होती हैं। इसके पर्यावरण के तत्व उत्पन्न होते हैं। इन सबका प्रभाव मानव की क्रियाओं पर पड़ता है। भौतिक प्रक्रियाओं में भूमि का अपक्षय, ताप विकिरण, संचालन, ताप संवहन, अवसादीकरण, वायु व जल की गतियाँ, जीवधारियों की गतियाँ, जन्म-मरण व विकास आदि आती हैं। इन प्रक्रियाओं द्वारा भौतिक पर्यावरण में अनेक क्रियायें उत्पन्न होती हैं। वे मानव के क्रिया-कलापों पर अपना प्रभाव छोड़ती हैं। भौतिक तत्वों में उन तथ्यों को सम्मिलित किया जाता है, जो भौतिक शक्तियों तथा प्रक्रियाओं के फलस्वरूप धरातल पर उत्पन्न होते हैं।
इन तत्वों के निम्न तीन भेद हैं-
(i) भाववाचक तत्व - प्रदेश की ज्यामितीय स्थिति, प्राकृतिक संस्थिति, प्रदेश का क्षेत्रफल या विस्तार, प्रदेश की आकृति व भौगोलिक अवस्थिति।
(ii) भौतिक तत्व - भूआकार, ऋतु एवं जलवायु, चट्टानें व खनिज, मिट्टियाँ, नदियाँ व जलाशय, भूमिगत जल, महासागर व तट।
(iii) जैविक तत्व - प्राकृतिक वनस्पति, प्रादेशिक जीव-जन्तु व सूक्ष्म जीवाणु।
उपरोक्त सभी तत्व मिलकर मानव पर्यावरण का निर्माण करते हैं और मनुष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं। इसे प्राथमिक, प्राकृतिक या भौतिक पर्यावरण आदि नामों से अभिहीत किया जाता है। ये समस्त तत्व प्रकृति की देन हैं, इनका मनुष्य ने सृजन नहीं किया है।
2. सांस्कृतिक या मानव-निर्मित पर्यावरण - मानव द्वारा निर्मित सभी वस्तुएँ सांस्कृतिक पर्यावरण की अंग हैं। मनुष्य अपनी तकनीकी के बल पर प्राकृतिक पर्यावरण के तत्वों को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप बना लेता है। वह भूमि को जोतकर कृषि करता है, जंगलों को साफ करता है, सड़कें, रेलमार्ग व नहरें आदि बनाता है, पर्वतों को काटकर सुरंगें बनाता है, नई बस्तियाँ बसाता है, भूगर्भ से खनिज निकालता है, अनेक यन्त्र व उपकरण बनाता है तथा प्राकृतिक शक्तियां का विभिन्न प्रकार से दोहन कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। मानव द्वारा बनाई गयी समस्त वस्तुएँ जिस संस्कृति को जन्म देती हैं, उसे मानव निर्मित संस्कृति या प्राविधिक पर्यावरण कहते हैं। इसे मानव की पार्थिव संस्कृति भी कहा जा सकता है। मानव को सांस्कृतिक पर्यावरण में औजार, गहने, अधिवास, परिवहन व संचार के साधन (वायुयान, रेल, मोटर, तार, जलयान), प्रेस आदि सम्मिलित किये जाते हैं। मानव की शारीरिक व बौद्धिक क्षमतायें भी मानव संस्कृति के ही अंग हैं। ये मानव की सांस्कृतिक-विरासत हैं। संस्कृति के इस भाग को अपार्थिव संस्कृति कहते हैं।
प्राकृतिक पर्यावरण की भाँति सांस्कृतिक पर्यावरण में भी शक्तियाँ, प्रक्रियायें और तत्व कार्य करते हैं। सामाजिक पर्यावरण मानव का नियामक माना जाता है तथा सामाजिक प्रक्रियाओं का निर्देशक।
(i) सांस्कृतिक पर्यावरण की शक्तियाँ - इसमें मानव (जनसंख्या) उसका वितरण एवं घनत्व, लिंगानुपात, आयु-वर्ग, प्रजातिगत रचना, शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक क्षमता तथा जनसंख्या में वृद्धि और उसके कारणों को सम्मिलित किया जाता है।
(ii) सांस्कृतिक प्रक्रियायें - इसमें पोषण (आहार), समूहीकरण, पुनरुत्पादन, प्रभुत्व, स्थानान्तरण, पृथक्करण, अनुकूलन, विशिष्टीकरण और अनुक्रमण को सम्मिलित किया जाता है। इन प्रक्रियाओं के द्वारा मानव व मानव समूह वातावरण से सामंजस्य स्थापित करते हैं।
(iii) सांस्कृतिक तत्त्व - व्हाइट एवं रेनर के अनुसार सांस्कृतिक पर्यावरण के तत्त्वों में निम्न तीन प्रतिरूप होते हैं-
(a) सामाजिक नियन्त्रण के प्रतिरूप - लोक रीतियाँ, रीति-रिवाज, मान्यतायें, आदर्श, संस्थायें-सरकार, विवाह-प्रथा, प्रशासन, कानून, पुलिस, युद्ध, विद्यालय, प्रेस आदि।
(b) क्रिया-सम्बन्धी प्रतिरूप - मनुष्य के आर्थिक उद्यम, राजनीतिक व सैन्य संस्थायें, शैक्षिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ, मनोरंजन एवं सौन्दर्य वृद्धि सम्बन्धी प्रयास।
(c) सांस्कृतिक भूदृश्य या निर्माण प्रतिरूप - इसके अन्तर्गत भूमि, उसका वर्गीकरण तथा उस पर उत्पन्न भूदृश्य नहरें, कृषि फसलें, पशुपालन, बस्तियाँ, कृषि व्यवस्थायें, खदानें, फैक्ट्रियाँ, बन्दरगाह, रेलमार्ग, सड़कें, संरक्षित स्थान (उद्यान, वन पार्क व मनोरंजन स्थल, श्मशान स्थल) आवासीय बस्तियाँ, राजनीतिक सीमायें, चुंगी, चौकियाँ, सैन्य किले आदि सम्मिलित किये जाते हैं।
मानव निर्मित पर्यावरण में पार्थिव संस्कृति में कल-कारखानों व यन्त्र उपकरणों का विशेष स्थान है। इनकी सहायता से मनुष्य अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं (भोजन, वस्त्र, मकान) की पूर्ति करता है। इनके अलावा सांस्कृतिक पर्यावरण के अपार्थिव घटक भी महत्वपूर्ण हैं। इनसे मानव समूह या समाज की आदतों, रीति-रिवाजों, आस्थाओं और अभ्यासों का ज्ञान होता है। मानव संस्कृति में भाषा, कलाओं, वैज्ञानिक ज्ञान, धार्मिक भावना, धर्म, परिवार व सामाजिक व्यवस्था, सम्पत्ति, सरकार, आर्थिक तन्त्र, संस्थायें, क्रीड़ा, संगीत, विशिष्ट संस्कार, उत्सव, पर्व, प्रथायें आदि भी महत्वपूर्ण होती हैं, जो पार्थिक संस्कृति का निर्माण करती हैं।
मानव द्वारा पार्थिव और अपार्थिव संस्कृति का उपयोग प्रायः साथ-साथ किया जाता है। इनसे मनुष्य की आवश्यकताओं और समस्याओं का निदान होता है।
अतः स्पष्ट है कि भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत सम्पूर्ण प्राकृतिक साम्राज्य की वे सभी शक्तियाँ, प्राक्रियायें तथा तत्व सम्मिलित हैं जिनका प्रभाव मानव की क्रियाओं, भोजन, वस्त्र तथा आदतों आदि पर पड़ता है। दूसरी ओर सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत मानव को संचालित करने वाले और सामाजिक क्रियाओं को निर्देशित करने वाले तत्व सम्मिलित हैं, जो मानव के जीवन स्तर पर निर्धारण करते हैं। अनुकूल पर्यावरण में जीवधारियों को कोई कठिनाई नहीं होती जबकि प्रतिकूल पर्यावरण में जीवों को रहने के लिए कठिनाई होती है। अनुकूल पर्यावरण उसे कहते हैं, जो किसी जीवधारी के अस्तित्व की रक्षा, विकास और उन्नति तथा वृद्धि में सहायक होता है। इसके विपरीत, जो पर्यावरण जीवधारी के अस्तित्व की रक्षा और विकास में बाधक होता है, उसे प्रतिकूल पर्यावरण कहा जाता है। कभी-कभी एक ही पर्यावरण किसी प्राणी या समूह के लिए एक परिस्थिति में अनुकूल हो सकता है तथा दूसरी स्थिति में प्रतिकूल हो सकता है। भिन्न-भिन्न पर्यावरण भिन्न-भिन्न प्राणियों के लिए अनुकूल तथा प्रतिकूल हुआ करते हैं।
पर्यावरण के सभी भौतिक तत्वों (अजैव व जैव) में पर्यावरण के अजैव तत्त्व-जलवायविक तत्व (सूर्य का प्रकाश एवं ऊर्जा, तापमान, वर्षा, आर्द्रता, वायु, वायुमण्डलीय गैसें आदि), स्थल जगत तत्त्व (उच्चावच, ढाल, पर्वतों की दिशा), जलीय स्रोत (सागर, झील, नदी, भूमिगत जल), मिट्टियाँ, खनिज व शैल (धात्विक व अधात्विक खनिज, ऊर्जा स्रोत एवं चट्टानें), भौगोलिक स्थिति (तटीय, महाद्वीपीय, सागरीय, द्वीपीय, पर्वतपदीय) आदि अधिक प्रभावशाली है। परन्तु जैव तत्वों में वनस्पति, जीव-जन्तु व सूक्ष्म जीवाणु भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। पर्यावरण के अजैव व जैव तत्व अपनी विशेषता के अनुसार पर्यावरण का निर्माण करते हैं। वे आपस में गुँथे हुए हैं। इनमें होने वाले परिवर्तनों का व्यापक प्रभाव पर्यावरण के विविध अंगों पर पड़ता है। उदाहरणार्थ जलवायु में परिवर्तन होने से स्थलाकृति का विकास, जल स्रोत, मिट्टी तथा जैव तत्व आदि सभी प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार वनस्पतियों में परिवर्तन का प्रभाव जलवायु और अन्य जीवों पर भी पड़ता है।
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